बैंक से हफ्ते पर गाडी खरीदने का आम तौर पर जो मामला होता है वो ना-जाइज है, इस लिए के उसमे साफ तौर पर सूद पाया जाता है, कियूंकि बैंक खुद नही बेचता है, बल्कि सूद पर कर्ज देता है, जिसका लौटाना हफ्ते की शक्ल में होता है, लेकिन इस मामले को जाएज शक्ल में लाने के लिये २ शर्त का लिहाज जरूरी है.
१.) खुद बैंक गाडी बचे, ओर सौदे (बैठक) के वक्त्त ही उसकी कीमत फिक्स हो जाये, चाहे कम हो या ज्यादा.
२.) हफ्ता वक्त्त पर अदा कर दिया जाए, अगर हफ्ते में ताखीर (लेट हो जाना) की वजह से ज्यादा रकम देनी पडे तो ये सूद हो जायेगा, जिसकी शरीयत में बिल्कुल इजाजत नही है.
मुस्तफ़ाद अज: [किताब-उन-नवाजील १/३१२ सवाल नंबर: ७७]
(मुफ्ती) बंदे इलाही कुरैशी गणदेवी
अनुवाद : मव.मकबूल मव.अय्यूब जोगियात (खरोड)

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